Story of Sadhguru’s previous birth

Story of Sadhguru’s previous birth l Sadhguru ke purv janm ki kahani in hindi

Sadhguru के previous birth के बारे में बात करें, इससे पहले थोड़ा गुरु शब्द से जुड़ी एक बात को समझ लेते हैं। आज के समय में अगर सबसे मुश्किल काम कोई है, तो वह है सही गुरु ढूंढना। हालांकि लोग यह भी कहते हैं कि जिस तरह से एक शिष्य को सही गुरु की तलाश होती है, वैसे ही गुरु को भी एक सच्चे शिष्य की तलाश होती है और जब सही समय आता है तो गुरु खुद ही अपने शिष्य को ढूंढ लेता है। लेकिन भाग दौड़ की इस जिंदगी में शिष्य के पास भी अब इतना पेशंस नहीं रह गया है कि वह सही गुरु की प्रतीक्षा कर पाए। ऐसे में वह ऐसे गुरु की तरफ बहुत जल्दी आकर्षित हो जाता है जिनकी पापुलैरिटी सबसे ज्यादा होती है और फिर अज्ञानतावश वह एक गलत गुरु के संगत में पड़ जाता है।

ऐसी स्थिति में समाज में चारों तरफ नजर घुमा कर देखेंगे तो एक ऐसे गुरु नजर आएंगे जो की एक योगी, युग दृष्टा, मानववादी, प्रकृति प्रेमी और आधुनिक गुरु है और वह है जग्गी वासुदेव सदगुरु। आज इन्ही सदगुरु जी के पिछले तीन जन्म की बात करने वाले हैं।

Sadhguru के पूर्व जन्म की कहानी

Sadhguru के पिछले जन्मों की बात करें उससे पहले लिए यह देख लेते हैं कि सदगुरु के द्वारा निस्वार्थ भाव से की जाने वाली कार्यों से आम जनमानस कितने लाभान्वित होते हैं!

ईशा फाउंडेशन एक स्वयंसेवी व अंतराष्ट्रीय लाभ रहित एक संस्था है, जिसकी स्थापना Sadhguru ने की। ईशा फाउंडेशन विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहा है। जिसकी वजह से दुनिया के करोड़ों लोगों को काफी लाभ मिला है, जिंदगी को सही तरीके से जीने के लिए एक नई दिशा मिली है।

जैसे मैंने पहले लिखा है Sadhguru एक योग दृष्टा हैं। इसका मतलब यह है कि सदगुरु ने कभी भी योग की कोई किताब पूरी नहीं पढ़ी है, फिर भी वह योग के गूढ़ रहस्यों को बहुत अच्छे से समझ चुके हैं।इसीलिए Sadhguru ने योग के इस गूढ़ आयामों को सभी आम जनमानस तक पहुंचाने के लिए इसे इतना आसान, इतना सहज बना दिया है कि हर व्यक्ति उस पर अमल करके उसको अपना सकता है और उस पर अमल करके अपने भाग्य का स्वामी खुद बन सकता है।

Sadhguru's previous birth

बिल्वा का जीवन Sadhguru का प्रथम जीवन

मध्य प्रदेश के रायगढ़ जिले में लगभग 400 साल पहले एक बिल्वा नाम का व्यक्ति रहता था। शारीरिक रुप से हृस्ट पुष्ट, गठीला बदन और ऊंची कद काठी का था। उसके अंदर डर नाम की कोई चीज थी ही नहीं। उसका जन्म सपेरों के कबीले में हुआ था। वह एक ऐसा व्यक्ति था जो सभी नियम कानून की परवाह ना करते हुए अपने हिसाब से रहता था।

एक तरह से बिल्वा विद्रोही प्रवृत्ति का इंसान था। बिल्वा को सबसे ज्यादा पीड़ा उस समय में मौजूद जाति प्रथा से थी। जिसकी वजह से वो समाज के कई गणमान्य लोगों की नजर में आ गया। फिर वही हुआ जो होता आया था। बिल्वा को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। इस समय बिल्वा की उम्र कुछ ज्यादा नही थी। फिर भी उसे पेड़ से बांध कर, उसके ऊपर सांप को छोड़ दिया गया। जिसकी वजह से उसकी मृत्यु हो गई। 

जिस सांप से बिल्वा को कटवाया गया था, वो सांप बिल्वा का ही था। वहां पर मौजूद सभी लोग बिल्वा की मौत का तमाशा देख रहे थे। जैसे जैसे सांप का जहर बदन में फैलता जा रहा था, बिल्वा की तकलीफ बढ़ती जा रही थी। तभी बिल्वा ने मन ही मन में तय किया कि इन जालिमों को अपनी भयानक मौत का तमाशा देखकर खुश नहीं होने दूंगा। फिर क्या था, उसने सजग होकर अपनी सांसों पर ध्यान देना शुरू किया और तब तक ध्यान देता रहा, जब तक कि उसकी सांसे थम नहीं गई।

बिल्वा एक शिव भक्त था। लेकिन उसने कोई साधना नहीं की थी। अपने अंतिम क्षणों में जिस तरह से सांसों पर पूरी जागरूकता के साथ ध्यान दिया, जिस तरह से पूरी जागरूकता के साथ अपना शरीर छोड़ा, उसने बिल्वा के अगले जन्म की राह निश्चित कर दी।

शिवयोगी का जीवन

Sadhguru का अगला जन्म एक शिवयोगी के रूप में था। अपने पिछले जन्म में, पूरी सजगता के साथ प्राण त्यागने का परिणाम ये हुआ कि अपने दूसरे जन्म में वे एक शिवयोगी के रूप में पुनः अवतरित हुए। लेकिन ये जन्म भी काफ़ी तकलीफ़ों भरा और कष्ट पूर्ण था।इस जन्म में सदगुरु ने दिल दहला देने वाला तप किया। उन्होंने कठोर तप करके योग में असाधारण योग्यता हासिल कर ली थी।

हमेशा की तरह, एक दिन शिव योगी अपनी ध्यान में बैठे हुए थे, तभी वहाँ से कोयंबटूर की दक्षिणी पहाड़ी पर रहने वाले महान संत श्री पलनी स्वामी वहाँ से गुजर रहे थे, पलनी स्वामी की नज़र शिवयोगी के ऊपर पड़ी।पलनी स्वामी शिवयोगी के अदभुत लगन और शिव के प्रति सच्ची चाहत को देख कर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।साथ ही पलनी स्वामी ये बात भी समझ गए कि इस हटी योगी को शिव के अलावा किसी का भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा।इस लिए पलनी स्वामी आदि-योगी के रूप में शिव योगी के सामने प्रकट हुए।

शिवयोगी पुरे भक्ति भाव से अपने आप को समर्पित कर दिया। पलनी स्वामी ने अपने छड़ी से शिवयोगी के माथे को छुआ, शिवयोगी तुरन्त ही उस अवस्था तक पहुँच गए, जिसकी तलाश वो पूरी ज़िंदगी करते आ रहे थे।

पलनी स्वामी और शिवयोगी की ये मुलाक़ात ना तो बहुत लम्बी थी और ना हाई कभी दुबारा मिलना हुआ।मगर इस छोटी सी मुलाक़ात में ही पलनी स्वामी ने शिवयोगी के अंदर एक ऐसा बीज बो दिया, जो आगे चल कर शिवयोगी को एक गुरु के रूप में प्रतिस्थिठत करने वाला था। साथ ही ध्यानलिंग को स्थापित करने की ज़िम्मेदारी भी थी। 

सत्तावन साल की उम्र में ही शरीर त्याग देने के कारण शिवयोगी अपने जीवन काल में गुरु के सपने को साकार ना कर सके। लेकिन ये सपना आने वाले अगले जन्म में भी जारी रहना  

सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा का जीवन 

बात बीसवीं सदी की शुरुआत की है। शिवयोगी पुनः धरती पर वापस लौट आए। इस बार वो दक्षिण भारतीय योगी व दिव्यदर्शी सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा के नाम से विख्यात हुए। 

सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा ने इस बार भी ध्यानलिंग को स्थापित करने की भरसक कोशिश की। लेकिन इस आध्यात्मिक प्रक्रिया को लेकर समाज के विरोध के कारण यह पूरा ना हो सका। इससे सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा काफ़ी गुस्से में थे। सद्‌गुरु ने अपने ग़ुस्से को क़ाबू में करते हुए कई महतवपूर्ण कार्य किए। फिर वो चलते हुए वेलिंगिरि पहाड़ों में लौट आए। इस जगह को उन्होंने अपने अंतिम प्रस्थान के लिए चुना। अपने सभी सात चक्रों के माध्यम उन्होंने यहाँ पर अपना शरीर त्याग दिया। यह कार्य एक दुर्लभ सिद्ध योगी ही कर सकता था। इससे पहले ऐसा स्वयं शिव ने किया था, जो मानवता के इतिहास में पहले योगी थे।

बयालीस साल की अल्प आयु में अपना शरीर त्यागने से पहले सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा ने घोषणा की थी, ‘मैं वापस आऊंगा।’

सदगुरु जग्गी वासुदेव : वर्तमान सदगुरु

अब शुरू होता है वर्तमान काल के, हम सब के बीच मौजूद सदगुरु जग्गी वासुदेव की जीवन यात्रा। सद्‌गुरु श्री बह्मा के शरीर त्यागने के बाद 3 सितंबर 1957 को मैसूर शहर में रहने वाले श्री वासुदेव और सुशीला दंपत्ति के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम जगदीश रखा गया। घर में लोग उन्हें प्यार से जग्गी बुलाते थे।

बड़े होने के पश्चात शुरुआती दिनों में कुछ समय तक जगदीश ने अपना कारोबार सम्हाला, और सफलता पूर्वक इसे चलाया भी। लगभग २५ साल की उम्र में २३ सितंबर १९८२ के दिन जगदीश जी के जीवन में कुछ ऐसा घटा कि उनका पूरा जीवन ही हमेशा के लिए बदल गया।

उस दिन वो मैसूर की चामुण्डी पहाड़ी पर चले गए। वैसे वो अक्सर वहां जाया करते थे लेकिन २३ सितंबर 1982 का दिन उनकी जीवन में परिवर्तन लाने वाला दिन था। वह अचानक ध्यान की गहरी अवस्था में चले गए । 

अपने इस अनुभव के बारे में सद्‌गुरु जी ने इनर इंजीनियरिंग किताब में विस्तार से बताया है। आप इस लिंक के थ्रू इस किताब के बारे में जानकारी ले सकते हैं। 

उस दिन सदगुरु जी को इस बात का एहसास तो हो गया कि उन्हें कुछ तो करना है, लेकिन क्या करना है, वो अभी भी clear नही हुआ था।

कुछ समय पश्चात सद्‌गुरु जी को ध्यान लिंग की स्थापना करने का एहसास हुआ। Finally पिछले दो जन्मों का सपना इस जन्म में जाकर पूरा किया। 

Inner Engineering Book Summary

Conclusion

सद्‌गुरु जी का कहना है कि सारा अस्तित्व बस एक ऊर्जा है, जो कि स्वयं को अनेकों रूप में प्रकट करती है।ध्यानलिंग की स्थापना इस लिए की गई ताकि आम जनमानस ध्यानलिंग की ऊर्जा का इस्तेमाल करके अपने इनर साइंस पर काम कर सके, आइक माध्यम से आप स्वयं अपने भाग्य के स्वामी बन सकते हैं। 

ध्यानलिंग की मदद से आप न केवल अपना मनचाहा जीवन रच सकते हैं, बल्कि अपने जीवन, जन्म तथा पुनर्जन्म की प्रक्रिया को भी तय कर सकते हैं।यहाँ तक कि आप ये भी तय कर सकते हैं कि आप को किस गर्भ से जन्म लेना है और साथ ही आप स्वेच्छा से मुक्त होने का रास्ता भी पा सकते हैं और मुक्त भी हो सकते हैं।

FAQ

Q1. ध्यानलिंग कहाँ पर स्थित है?

ध्यानलिंग ईशा योग सेंटर में स्थित है।ईशा योग सेंटर Coimbatore, Tamilnadu में स्थित है। 

Q2. ध्यानलिंग का निर्माण किसने करवाया था?

ध्यानलिंग का निर्माण सदगुरु जग्गी वासुदेव ने करवाया था। सदगुरु जग्गी वासुदेव ईशा योग केंद्र के संस्थापक भी है। 

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